बालाघाट स्वास्थ्य विभाग में डिग्री विवाद, पुराने सत्यापन और नई जांच के नतीजों ने बढ़ाई उलझन
बिरसा के पूर्व बीएमओ डॉ. सुनील सिंह के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी, शासन ने एफआईआर के लिए दिए निर्देश; नियुक्ति से लेकर शैक्षणिक रिकॉर्ड तक उठे सवाल
बालाघाट। बालाघाट जिले के स्वास्थ्य विभाग में पूर्व खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुनील सिंह की शैक्षणिक योग्यता को लेकर मामला गंभीर हो गया है। शासनस्तर पर हुई जांच में उनकी एमबीबीएस डिग्री को फर्जी बताए जाने के बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश जारी किए गए हैं। करीब पांच महीने चली जांच के बाद 9 अक्टूबर 2026 को सामने आए इस घटनाक्रम ने विभागीय नियुक्तियों में दस्तावेजों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले की अहम कड़ी वर्ष 2024 में हुई जांच है। उस समय तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडेय ने रीवा के दो शैक्षणिक संस्थानों से मिले पत्रों के आधार पर डॉ. सुनील कुमार सिंह की डिग्री को सही बताया था। अब वर्ष 2026 में शासन की जांच में इसके विपरीत निष्कर्ष सामने आने से यह जानना जरूरी हो गया है कि दोनों जांचों के परिणाम अलग-अलग क्यों रहे।
यह मामला अब केवल एक डिग्री की प्रमाणिकता तक सीमित नहीं है। इसमें नियुक्ति के समय प्रस्तुत दस्तावेजों, मेडिकल रजिस्ट्रेशन और पूर्व में किए गए सत्यापन की प्रक्रिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
संविदा सेवा से नियमित पद तक पहुंचने की कहानी
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, डॉ. सुनील सिंह ने वर्ष 2009 में संविदा स्वास्थ्य अधिकारी के रूप में स्वास्थ्य विभाग में सेवाएं शुरू की थीं। उन्होंने बिरसा और दमोह में पदस्थ रहते हुए काम किया। वर्ष 2012 में उन्हें नियमित किया गया। बाद में उन्हें बिरसा में खंड चिकित्सा अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई।
बताया गया है कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन के आधार पर हुई थी। शुरुआती दौर में स्थायी पंजीयन से संबंधित दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठे थे। बाद में एमबीबीएस डिग्री और पंजीयन की प्रमाणिकता पर शिकायतें सामने आईं, जिसके बाद मामले की जांच शुरू हुई।
शासन की हालिया जांच में डिग्री को फर्जी बताए जाने के बाद नियुक्ति के समय जमा कराए गए शैक्षणिक दस्तावेजों की पड़ताल भी जरूरी हो गई है। अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि नियुक्ति और नियमितीकरण के दौरान प्रस्तुत अभिलेखों का सत्यापन किस प्रकार किया गया था।
दो जांचों में अलग तस्वीर, अंतर की वजह क्या?
इस प्रकरण में 5 जून 2024 को तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडेय द्वारा जारी निष्कर्ष महत्वपूर्ण है। उस समय श्यामशाह मेडिकल कॉलेज रीवा और अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा से प्राप्त पत्रों के आधार पर डॉ. सुनील कुमार सिंह की एमबीबीएस डिग्री को सही माना गया था।
इसके बाद वर्ष 2026 में शासनस्तरीय जांच में डिग्री को फर्जी बताए जाने की बात सामने आई। दोनों निष्कर्षों के बीच अंतर ने पहले किए गए सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब जांच में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों बार समान दस्तावेजों की जांच की गई थी, क्या बाद की जांच में कोई अतिरिक्त जानकारी सामने आई और क्या दोनों निष्कर्षों के पीछे अलग-अलग आधार थे।
बिना दोनों जांच रिपोर्टों और मूल दस्तावेजों का परीक्षण किए इस अंतर की वास्तविक वजह बताना संभव नहीं है। इसलिए मामले में अभिलेखों का तुलनात्मक परीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रीवा से मिले पत्रों में दर्ज था प्रवेश, परीक्षा और इंटर्नशिप का विवरण
वर्ष 2024 में डिग्री को सही मानने के लिए जिन दस्तावेजों का उल्लेख किया गया था, उनमें श्यामशाह मेडिकल कॉलेज रीवा और अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के पत्र शामिल थे।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, श्यामशाह मेडिकल कॉलेज के डीन ने 3 अप्रैल 2024 को जारी पत्र में उल्लेख किया था कि एमबीबीएस बैच 2000 में प्रवेश लेने वाले डॉ. सुनील कुमार सिंह, पिता मोहन सिंह, ने 27 दिसंबर 2000 को पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। पत्र के मुताबिक, उन्होंने सितंबर-अक्टूबर 2006 में एमबीबीएस की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण की और 24 नवंबर 2006 से 23 नवंबर 2007 तक एक वर्ष की इंटर्नशिप पूरी की थी।
वहीं, विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग की ओर से जारी पत्रों में भी परीक्षा परिणाम का विवरण दर्ज था। असिस्टेंट रजिस्ट्रार (परीक्षा) के 23 मई 2024 और डिप्टी रजिस्ट्रार (परीक्षा) के 17 मई 2024 के पत्रों के अनुसार, डॉ. सुनील कुमार सिंह ने सितंबर-अक्टूबर 2006 में एमबीबीएस की अंतिम परीक्षा रोल नंबर 129 से उत्तीर्ण की थी। उन्हें 200 में से 119 अंक प्राप्त होने का उल्लेख भी किया गया था।
इन पत्रों को आधार बनाकर तत्कालीन सीएमएचओ ने डिग्री को सही माना था। अब शासन की जांच में विपरीत निष्कर्ष आने के बाद इन अभिलेखों का मूल रिकॉर्ड से मिलान महत्वपूर्ण हो गया है।
देवास के एक डॉक्टर के नाम का भी जांच में उल्लेख
बालाघाट के सीएमएचओ डॉ. शत्रुघ्न सिंह दाहिया ने बताया कि शासन स्तर पर डॉ. सुनील सिंह की डिग्री की जांच पूरी हो चुकी है। उनके अनुसार, शासन ने डिग्री को फर्जी पाया है और एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश जारी किए हैं। संबंधित अधिकारी को इस संबंध में पत्र भी लिखा गया है।
सीएमएचओ ने दावा किया कि जांच में देवास के एक डॉक्टर के नाम पर डॉ. सुनील सिंह के बालाघाट में नौकरी करने की बात सामने आई है।
यह दावा मामले को और गंभीर बनाता है। हालांकि, इस संबंध में दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति और कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी। जांच में यह भी स्पष्ट करना होगा कि नियुक्ति के दौरान कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे और उनका सत्यापन कैसे हुआ था।
पुलिस कार्रवाई के बाद सामने आएंगे महत्वपूर्ण तथ्य
शासन की ओर से एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश जारी किए जाने के बावजूद खबर लिखे जाने तक बिरसा थाने में मामला दर्ज नहीं हुआ था। थाना प्रभारी विजय कैन ने बताया कि फिलहाल डॉ. सुनील सिंह के मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस शैक्षणिक डिग्री, परीक्षा परिणाम, इंटर्नशिप प्रमाणपत्र, मेडिकल रजिस्ट्रेशन और नियुक्ति से जुड़े अभिलेखों की जांच कर सकती है। इसके साथ ही वर्ष 2024 में डिग्री को सही बताने वाले निष्कर्ष और वर्ष 2026 में उसे फर्जी बताए जाने के आधारों का परीक्षण भी महत्वपूर्ण होगा।
इस जांच से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि संबंधित शैक्षणिक रिकॉर्ड किस व्यक्ति से जुड़े हैं, उनकी प्रमाणिकता की पुष्टि किस प्रकार की गई और नियुक्ति के समय प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच में निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं।
विभागीय सत्यापन व्यवस्था की भी हो सकती है पड़ताल
डॉक्टर की डिग्री से जुड़ा यह मामला स्वास्थ्य विभाग की दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर भी ध्यान आकर्षित करता है। यदि जांच में नियुक्ति या नियमितीकरण के दौरान किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की जा सकती है।
हालांकि, फिलहाल किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इसके लिए जांच रिपोर्टों, नियुक्ति संबंधी अभिलेखों और संबंधित अधिकारियों के पक्ष का परीक्षण जरूरी होगा।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि वर्ष 2024 में डिग्री को सही मानने का आधार क्या था और वर्ष 2026 में शासन की जांच किस आधार पर विपरीत निष्कर्ष तक पहुंची। इन सवालों का जवाब सामने आने के बाद ही पूर्व की जांच और नियुक्ति प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
अधिकारियों का पक्ष
विजय कैन, थाना प्रभारी, बिरसा: फिलहाल डॉ. सुनील सिंह के मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
डॉ. शत्रुघ्न सिंह दाहिया, सीएमएचओ, बालाघाट: शासन ने डिग्री की जांच पूरी कर उसे फर्जी पाया है। एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश जारी किए गए हैं और संबंधित अधिकारी को पत्र लिखा गया है। सीएमएचओ के अनुसार, जांच में देवास के एक डॉक्टर के नाम पर बालाघाट में नौकरी करने की बात सामने आई है।
अब इन सवालों के जवाब का इंतजार
शासन के निर्देश के बाद अब पुलिस कार्रवाई और दस्तावेजों की जांच पर नजर है। मामले में तीन बिंदु विशेष महत्व रखते हैं—डिग्री की वास्तविक प्रमाणिकता, वर्ष 2024 और 2026 की जांच के निष्कर्षों में अंतर तथा नियुक्ति के समय हुए दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया।
इन सभी पहलुओं पर जांच पूरी होने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

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